मेरे प्रेम की परिभाषा
मैं एक शृंखला का उद्घाटन कर रहा हूँ जहाँ मेरे अटपटे दर्शन और विचार होंगे। पाँच दर्शन लिख चुका हूँ। यह पूरा कर लिया है।
मेरे अटपटे दर्शन - 1
मेरे पास ही मेरी बेटी सो रही है, सान्वी। मैं उसके सोते हुए चेहरे को देखकर, आज के उसके खेल को याद करके मुस्कुरा रहा हूँ। पहले उसने अपना खिलौने वाला किचन सेट निकाला, फिर तरह-तरह के खिलौनों से उसे सजाकर मुझे सैंडविच खिलाया, फ्रेंच फ्राइज़ खिलाए और ठंडा पानी पिलाया। फिर वह खुद ग्राहक बनी और मुझसे बर्गर माँगा। यह खेल लगभग एक घंटे चला; शायद उसने यह सब किसी कार्टून से सीखा होगा। वह एक घंटा कहाँ बीत गया, पता ही नहीं चला। उसके चेहरे का भोलापन, उसका हँसना, रूठना, सब देखता रहा और खुश होता रहा। मन ही मन सोचा कि मैं कितना भाग्यशाली हूँ। बस यही सब उसका चेहरा निहारते हुए याद कर रहा हूँ।
नींद नहीं आ रही थी। छोटे बल्ब की रोशनी, जो हम सोते समय जलाते हैं, उसके चेहरे पर पड़ रही थी। नींद न आने का कारण कुछ और नहीं, बस उसका बुखार था, जो आज शाम ही उसका नया मेहमान बना है। उसके बुखार में मुझे नींद नहीं आती। मैं हर आधे घंटे में उसके माथे पर हाथ रखता हूँ और बुखार कितना है, यह देखने के लिए उसकी गर्दन और कलाई भी छूकर देखता हूँ। मेरी माँ भी नहीं सोई थीं, और यह बात मुझे सुबह पता चली जब उन्होंने कहा, “तुम आधा घंटा भी नहीं रुकते थे, हर पंद्रह मिनट में उसका बुखार देख रहे थे।”
मेरे प्रेम की परिभाषा यही है।
फिर मुझे आज शाम का एक वीडियो याद आया, जिसमें एक कथावाचक बता रहा था कि नुसरत साहब ‘दूल्हे का सेहरा’ गाते-गाते रो पड़ते थे। फिर मैंने अपनी बेटी को देखा और सोचने लगा कि यह भी एक दिन मुझसे दूर चली जाएगी। पढ़ाई के लिए, घूमने के लिए, नौकरी के लिए या अपने प्रेमी के साथ रहने। मैंने उसके लिए पैसे जोड़ने भी शुरू कर दिए हैं। उसकी शादी के लिए नहीं, बल्कि यह पैसे मैं उसके अठारहवें जन्मदिन पर उसे दूँगा। वह उन पैसों से दो ही काम कर सकती है, या तो कुछ महीने या साल भर घूमने जा सकती है, या फिर अपना कोई काम-धंधा शुरू कर सकती है। मुझे लगता है कि सभी माता-पिता को ऐसा ही करना चाहिए। इससे बच्चे जीवन के चारों अर्थ “धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष” समय से समझ जाएँगे और अपने दुखों को खुद भोगने के बजाय एक दर्शक की तरह देख सकेंगे। हम पैसे उनकी शादी के लिए बचाते हैं, पर हमें उनकी यात्रा और उनके काम को आसान बनाना चाहिए।
मुझसे अपनों से अलग होना सहा नहीं जाता। शायद ही धरती पर कोई ऐसा इंसान हो जिसे बिछड़ना अच्छा लगता हो, पर मेरा किसी अपने से अलग होना दीमक की तरह भीतर से कुरेदता है। बिछड़ने के बाद मेरी लड़ाई खुद से बहुत लंबी चलती है। जीत तो कभी नहीं पाता, हर रोज़ हारता हूँ, यह बात अलग है।
फिर याद आता है कि मैं दर्शन का साधक हूँ, मुझे अभी से ये बातें परेशान नहीं कर सकतीं। पर मन तो मन है, यह कहाँ टिकता है!
फिर मन का साधक चुप नहीं रह पाता। सोचने लगा कि मेरे जाने के बाद एक दिन मेरी गुड़िया भी बूढ़ी होगी और यह शरीर छोड़ेगी। यह जीवन मेरी गुड़िया का भी एक दिन साथ छोड़ेगा। मेरी गुड़िया के चेहरे पर भी झुर्रियां आएँगी।
यह सब सोचने के बाद फिर से हाथ उसके माथे पर गया। विपश्यना में सिखाए गए सीधे बहाव की तरह, पहले गर्दन, फिर कलाई और फिर पैरों को छूकर तसल्ली हुई कि दवाई ने असर कर दिया है और अब बुखार उतर चुका है।
अब कल सुबह इसे डराया जाएगा कि मीठा नहीं खाना, चॉकलेट नहीं खानी, किंडर जॉय और लॉलीपॉप को हाथ भी नहीं लगाना; बस अंडे खाने हैं। बुखार बस यही एक अच्छा काम कर गया कि इसके अंडे शुरू करवा गया।
तीन-चार दिन जब तक यह ठीक नहीं होती, मेरी नींद भी गायब रहेगी। कुछ दिन बाद जब इसे स्कूल से लेकर लौटूँगा, तो गाड़ी अपने आप बाज़ार की तरफ मुड़ जाएगी और खरीदा जाएगा एक लॉलीपॉप, एक इसके लिए और एक इसकी सहेली के लिए।
तब बुखार शरीर से ही नहीं, सिर से भी उतर चुका होगा, प्यार और दुलार के आगे हार मानकर।
प्रेम कभी आँकड़ों या नियमों से नहीं चल सकता; यह सिर्फ भावों से बहता है। हिसाब-किताब के रिश्तों में ही आज का कलियुग बसता है, पर इस युग में भी प्रेम को शिव और पार्वती के भाव ने ही बचाकर रखा है।

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