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मेरी आख़िरी कविता

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एह मेरी कविता, मैं अब तुझसे विदा लेता हूँ। तेरे घर में कितने कामयाब कवि ठहरे होंगे, कितने सफ़र पर चलते हुए यहाँ ठहरे होंगे। पर मेरा ठहरना तेरे आँगन में, बस इतना ही था। मैं अगर कुछ देर और बैठा, तो यह अपमान होगा उनके लेखन का, जिनका यहाँ आना अभी शेष था। मैं अब कवि नहीं रहा। मुझे अब यह कुदरत आकर्षण नहीं देती। रात मित्र नहीं है, वृक्ष संगीत नहीं देते। जिस देह पर कितने गीत अभी लिखे जाने थे, वह प्रेम की सियाही अब मेरी कलम में नहीं रही। मेरे दृश्य अब, प्रेम की कल्पना नहीं करते। मुझे चेहरे एक-से दिखने लगे हैं, और मेरा दर्पण, मुझे दैनिक सलाह देता है, कि तुम अब कवि नहीं हो। इसलिए मैंने हफ़्तों से, दर्पण नहीं देखा। मैं कवि जन्मा हूँ, तो कवि ही मरूँगा। पर मेरी साधना मुझे यह विश्वास दिला रही है, कवि, तुम्हें जीवन ने नहीं, प्रेम ने बनाया था। अब कवि होना, उसका अभिनय करने जैसा है, जैसे बड़े शहरों में लोग मित्रता का अभिनय करते हैं। एह कविता, मुझे एक नए पथ पर निकलना है। मुझे यह भूलना है, कि मैं एक कवि था। उस पथ में अनुराग, ममता, आसक्ति, अवैर, करुणा, सब होगा, पर प्रेम नहीं होगा। कोई राह पूछेगा प्रेम की, त...

एकांत - गोपाल

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एकांत में हो, तो बात हो सकती है स्वयं से, विवाद से संवाद तक की यात्रा सरल करता है एकांत। प्रेम का एकांत में चिंतन करना किस्से नहीं, कहानियाँ लिखता है। वे कहानियाँ, जिनकी मृत्यु, धरती के जीवन जितनी लंबी होती है। एकांत में रहने वाले व्यक्ति, लिख लेते हैं साहित्य, सुन पाते हैं पत्तियों का गीत, बोल लेते हैं कविताएँ, देख सकते हैं विवादित चेहरों के भीतर, वे दर्शन कर पाते हैं ग्रंथों का, और बिन घोषणा हो सकते है बुद्ध। एकांत कोई कला नहीं है, यह कलाकार का, कला से पहला परिचय है। एकांत में रहना, जीवन की मृत्यु से मित्रता करवाना है। मनुष्य ने जितने भी, आविष्कार आज तक किए हैं, वे शोर में नहीं, एकांत की गोद में ही जन्मे हैं। पर्वत, झरने, जंगल, सागर, हमारे सहायक हैं, एकांत में रहने के लिए, इसीलिए, शहरों से थककर, लोग उनके पास लौट जाते हैं। एकांत हमें ले जाता है, गर्भ की अवस्था में, जहाँ शब्द नहीं थे, पर स्नेह था, प्रेम था, और मौन था। एकांत में होना, प्रेमी होने जैसा है। जहाँ जीवन, कुछ देर के लिए, गतिहीन, विशेष, और सुंदर हो जाता है।